ईसाई तीर्थ स्थल

ईसाई धर्म हिमाचल प्रदेश में अंग्रेजों के आने के बाद अस्तित्व में आये। यहाँ पर स्थित गिरिजाघर 150 वर्ष से अधिक पुराने नहीं हैं। ब्रिटिश राज के अवशेष -ऊँचे गिरिजाघर मुख्यत: छोटे छोटे पहाड़ी इलाकों में मिलते है जहाँ ब्रिटिशों ने अपनी ग्रीष्मकालीन आवास बनाये थे।

कसोली:कसोली अभी भी उतना ही अमलिन और खूबसूरत है जैसा ब्रिटिश इससे 50 वर्ष पहले छोड़ कर के गये थे। यहाँ एक पुराना गिरिजाघर है, ईसाई गिरिजाघर पारम्परिक अंग्रेजी ढांचे पर बना हुआ है। इसकी नीवें 1844 ई में रखी गयी थी।

क्राइस्ट चर्च कसौली

शिमला: शिमला के रिज पर स्थित यह गिरिजाघर अपने विशालकाय शिखर से प्रसिद्ध है। इसका विशालकाय शिखर शिमला से 8 कि.मी. दुरी पर स्थित तारा देवी से ही दिखना शुरू हो जाता है। 1844 में इस गिरिजाघर का निर्माण किया गया जब शिमला भारत के एक मुख्य पर्यटक स्थल के रूप में सामने आने लगा। ईसाई गिरिजाघर का निर्माण इस उदेश्य से किया गया की यहाँ पर स्थित सभी ईसाई एक साथ मिल कर समागम कर सकें। कांच की खिडकियों पर बने यादगार चिन्हों से गिरिजाघर के अंदर प्रकाश हो जाता है। पहले सेंट् मिचेल गिरिजाघर का निर्माण शिमला के निचले बाज़ार के पश्चिमी छोर पर 1850 में किया गया। बाद में यह एक वास्तुकला का एक अद्भुत नमूना बन गया।

CHRIST CHURCH SHIMLA

क्राइस्ट चर्च शिमला

धर्मशाला: पत्रों से बना हुआ सेंट् जान गिरिजाघर "मेक्लेओद्गंज और फोर्स्त्यग्न्ज" के बीच वाहन योग्य सड़क पर निचली धर्मशाला से 8 कि.मी. की दुरी पर स्थित है। यहाँ भारत के वायस राय लार्ड एल्गिन का एक स्मारक है जिनको यहाँ दफनाया गया है।

CHRIST CHURCH DHARAMSHALA

क्राइस्ट चर्च धर्मशाला

डलहौजी: चंबा स्थित डलहौजी एक अन्य पहाड़ी इलाका है, जहाँ अनेक पुराने गिरिजाघर हैं। मुख्य डाकघर के समीप स्थित गिरिजाघर अभी भी समय से अछुता है। इसकी पष्टकोनियों स्लेटों से बनी हुई खुबसूरत कोणीय छत है। सुभाष चाक के समीप ऊँचे चीड़ के पेड़ों के बिच स्थित सेंट् फ्रांसिस का कथेलिक गिरिजाघर सन 1894 में बना था।