गोरखा और सिख युद्ध


लड़ाकू प्रजाति गोरखा नेपाल में सन 1768 में सत्ता में आई। उन्होंने अपनी सैनिक शक्तियाँ संग्रहित की और अपना सम्राज्य बढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे गोरखाओं ने पहाड़ी राज्यों सिरमौर और शिमला पर कब्ज़ा कर लिया। उम्र सिंह थापा के नेत्रित्व में गोरखाओं ने काँगड़ा पर कब्जा करना शुरू कर दिया। उन्होंने 1806 ई में काँगड़ा के राजा संसार चंद को पहाड़ी मुखियाओं के साथ मिल कर हरा दिया। हालाँकि गोरखा काँगड़ा किले जो 1809 में महाराजा रणजीत सिंह के अधीन आ गया था पर कब्जा नही जमा पाए। इस हार के बाद गोरखाओं ने दक्षिण की तरफ बढना शुरू कर दिया। इसका परिणाम गोरखाओं और अंग्रेजों का युद्ध हुआ। तराई के क्षेत्रों में गोरखाओं का अंग्रेजों के साथ सीधा सामना हुआ जिसके बाद अंग्रेजों ने उन्हें पूर्वी सतलुज के पहाड़ी इलाकों से निकल बाहर किया। इस तरह से ब्रिटिश धीरे-धीरे इस राज्य में एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरने लगे।

अंग्रेज़ गोरखा युद्ध के बाद पंजाब और ब्रिटिश राज्य की साँझा सीमा अधिक संवेदनशील हो गयी। सिख और अंग्रेजों में से कोई भी सीधी लड़ाई नही लड़ना चाहता था, परन्तु रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद खालसा सेना ने ब्रिटिशों के साथ अनेक युद्ध किये। सन 1845 में जब सिखों ने सतलुज को पर कर ब्रिटिश राज्य पार आक्रमण किया तो कई पहाड़ी राज्यों के शासकों ने अंग्रेजों का साथ दिया क्यूंकि वे अंग्रेजों के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाने का मौका ढूढ रहे थे। इनमें से कई शासक अंग्रेजों के साथ गुप्तवार्ता करने लगे। पहले एंग्लो सिख युद्ध के बाद अंग्रेजों ने सिखों द्वारा खाली किये गये पहाड़ी राज्य उनके असली मालिकों को नहीं लौटाए।